मंदिर तोड़कर नहीं बनाई गई कुतुब मीनार, अदालत ने दिया फैसला

मंदिर तोड़कर कुतुब मीनार बनाए जाने का दावा अदालत में खारिज हो गया। दरअसल, दावा किया गया था कि कुतुब मीनार मंदिर को तोड़कर बनाया गया है। सिविल जज सीनियर डिवीज़न नेहा शर्मा ने सिविल सूट नंबर 875/2020 तीर्थांकर लार्ड ऋषभ देव आदि बनाम सेक्रेटरी, मिनिस्ट्री ऑफ़ कल्चर आदि ) को आर्डर 7 रूल 11 CPC के तहत  खारिज कर दिया।

वादी ने आरोप लगाया था कि मुस्लिम शासक मोहम्मद गौरी ने जैन और हिन्दू मंदिरों को तोड उनके मलबे से क़ुतुब मीनार का निर्माण किया था। ऐसे में उन मूर्तियों की पूजा का अधिकार मिलना चाहिए और इसके लिए एक ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए।

एडवोकेट असद हयात ने बताया कि अदालत में हमने अदालत मे साक्ष्य रखते हुए दलील दी कि क़ुतुब मीनार और इसके पूरे कॉम्लेक्स को 16 जनवरी 1914 को भारत सरकार द्वारा सरकारी गज़ट प्रकाशित कर संरक्षित स्मारक घोषित किया था। उस समय (बल्कि उस के भी 700-800 साल पूर्व से) इस इमारत में किसी भी धर्म के अनुयाइयों द्वारा कोई धार्मिक पूजा /इबादत नहीं होती थी।

किसी भी व्यक्ति ने 1904 के Act के अंतर्गत संरक्षित इमारत घोषित करने के नोटिफिकेशन को रद्द करने या अपना पूजा करने का अधिकार बहाल करने के लिए कोई सूट 1914 वर्ष या उसके तीन वर्ष बाद तक दाखिल नहीं किया।

बता दें कि महरौली में स्थित क़ुतुब मीनार को क़ुतुबुद्दीन ऐबक और उनके उत्तराधिकारी शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने 1200 ईस्वी में बनवाया था। इसी के पास क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद ऐबक के दौर में बनाई गई थी। इसी मस्जिद को लेकर दावा किया गया था कि इसको ब्ननाने के लिए दर्जनों हिन्दू और जैन मंदिरों के स्तंभों और पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था।

इस मामले में साबित हुआ कि क़ुतुबमीनार काम्प्लेक्स एरिया में इस स्मारक के निर्माण 1191 वर्ष से अब तक कोई मंदिर नहीं है और इसके पूर्व कोई मंदिर था, इसका कोई साक्ष्य पुख्ता नहीं है। Places of Worship Act 1991 भी इस तरह के मुद्दे पर किसी केस को चलाने की इज़ाज़त नहीं देता और व्यवस्था देता है कि 15 अगस्त 1947 को जो स्थिति थी, वही कायम रहेगी और कोई मुकदमा इसको बदलने के लिए नहीं चलाया जा सकता।

क़ुतुब मीनार 1904 के एक्ट के तहत संरक्षित ईमारत घोषित की गयी थी इसलिए 1958 के एक्ट का कोई प्रावधान इस पर लागू नहीं होता और Places of Worship Act 1991 इस पर लागू होगा।

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