मुस्लिम बच्चे मदरसे की दीवार लांघ कर ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज में पढ़ने के ख़्वाब पूरे कर रहे हैं।

सैयद जैगम मुर्तजा

अभी एक साहब ने कहा कि मुसलमानों में अशिक्षा और मानसिक पिछड़ापन बहुत है। ऐसी बात सुनकर आपको भी हंसी आती है न? मुझे तो बहुत आती है। ये लोग अभी भी 1991 से पहले के दौर में जी रहे हैं। उनको ख़बर ही नहीं कि 1991 के बाद से गंगा का पानी समुद्र के रास्ते अब सिंगापुर, दुबई, दोहा, लंदन, न्यूयॉर्क और जाने कहां कहां पहुंच गया है। ऐसे ही एक साहब ने लिखा कि मुसलमान अपनी लड़कियों को नहीं पढ़ाते। फिर एक स्क्रीनशॉट ठेल दिया।

मैं बस इतना कहता हूं कि माना संसाधन कम हैं, रास सख़्त है, लेकिन चाहत हर परेशानी पर भारी है। आंकड़े कहां से आ रहे हैं और क्या कह रहे नहीं मालूम लेकिन मैं बांदीपुरा से वेल्लोर तक और जोरहाट से जामनगर तक घूमा हूं। गांव, शहर, मलिन बस्ती, और पाॅश एरिया में ठहरा हूं, , घूमा हूं, अपनो आंखो से देखा है। 90 के दशक के बाद की दुनिया अलग है, ख़ासकर मुसलमान के लिए।

मेरा मानना है कि 1990 का दशक भारत के मुसलमानों की नवचेतना का दशक है। एक तो बाबरी विध्वंस, फिर सांप्रदायिक सत्ता ने उसकी नींद तोड़ी और बताया कि आगे बढ़ने के दो ही रास्ते हैं, पढ़ो, या कुछ बड़ा करो। इसी काल में खुली बाज़ार व्यवस्था ने उसे नए रास्ते दिखाए। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से मुसलमान को दो फायदे हुए। एक तो वहां साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव कम था, दूसरे ये कंपनियां काम ईओ तरजीह दे रही थीं। यानी पढ़कर नौकरी नहीं मिलेगी वाला अवरोध हट गया। जो लड़के निजी क्षेत्र में आगे बढ़े वह दूसरों के लिए मिसाल बने। 1990 के बाद ड्राप ऑऊट रेट समस्या है लेकिन हर बच्चा एक बार स्कूल ज़रूर देख रहा है। कुकुरमुत्ता टाइप सही, लेकिन स्कूल खुले हैं और इस दौरान अंग्रेज़ी माध्यम उनकी पारंपरिक उर्दू, अरबी, फारसी की शिक्षा पर हावी रहा है। लड़कियां न सिर्फ स्कूल जा रही हैं बल्कि कई घरों में लड़कों से ज़्यादा, लड़कों से बेहतर डिग्री हासिल कर रही हैं। रही मानसिक पिछड़ेपन की बात, तो चाहे इसे चुनौती मान लें और एक बार आज़मा लें। एक औसत मुसलमान बच्चे की समझ और दुनिया के बारे में उसका ज्ञान बाक़ी लोगों से ज़्यादा है। बल्कि कई जगह तो समस्या अति ज्ञान की हो चली है।

दुनिया की हर बड़ी यूनिवर्सिटी, हर प्रतिष्ठित कालेज, और हर बड़ी कंपनी में उच्च पदों पर भारतीय मुसलमान ज़रूर है। हाल के दिनों में जबकि हिजाब, अल्पसंख्यक संस्थान, धार्मिक हिंसा, नफरती हमले बढ़े हैं तो शायद लोगों को लगता होगा कि मुसलमान घरों में बैठ गए हैं और भविष्य को लेकर चिंतित नहीं हैं, तो यह भी स्टीरियोटाइपिंग है। मेरा मानना है परेशानी में ही मुसलमान बेहतर परफार्म करते हैं वरना चादर तान कर सोते हैं।

बस दुख इस बात का है कि मुसलमान लड़के और लड़कियों की सफलता की कहानियों से मुल्क का एक वर्ग प्रफुल्लित नहीं हो रहा। अपनी स्थिति सुधारने के बजाय वह सिर्फ उलाहने देने, पंचर छाप, मदरसा छाप जैसे कुंठित शब्द गढ़कर ही ख़ुश है। कुछ लोग तो मुसलमानों की इस ताज़ा-ताज़ा सफलता से चिंतित भी हैं। यूपीएससी, मेडिकल, आईआईएम, आईआईटी, टिस, के अलावा ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज, येल, स्टेनफोर्ड, हार्वर्ड, केलिफोर्निया, ज़्यूरिख, येल जैसे संस्थानों में सीमित संख्या में सही लाकिन 1990 के बाद जन्मे बच्चे पहुंच रहे हैं तो सुदर्शन के चव्हाणके जैसे लोग बौराए हुए हैं। वह इससे ख़ुश नहीं है जबकि यह शुरूआत देश के लिए आने वाले समय की बड़ी उपलब्धि है।

ख़ैर, जो लोग आगे बढ़ रहे हैं, ग़रीबी के बंधन तोड़कर आगे निकल रहे हैं, और अपनी परेशानियों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहे हैं उनको इस सबकी फिक्र नहीं होनी चाहिए। पूरी दुनिया उनके लिए बाहें फैलाए खड़ी है। बस चलते रहो, पढ़ते रहो, आगे बढ़ते रहो। मुझे ख़ुशी है कि जिस काल में देश का कथित पढ़ा लिखा वर्ग वैदिक विज्ञान और संस्कृत में अल्गारिदम खोज रहा है, मुसलमान बच्चे मदरसे की दीवार लांघ कर ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज में पढ़ने के ख़्वाब पूरे कर रहे हैं।

(लेखक युवा पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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